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चंपई सोरेन मुख्यमंत्री बनने के बाद हेमंत सोरेन के लिए ‘मांझी’ बनते हैं या…

Desk : झारखंड की राजनीति में चंपई सोरेन के उभार ने बिहार और तमिलनाडु की राजनीति की याद दिला दी है। हेमंत सोरेन बिहार जैसा जो प्रयोग चाहते थे, वो तो नहीं हुआ लेकिन दूसरा हो गया।

बिहार में मुख्यमंत्री पद को लेकर दो प्रयोग चर्चित रहे हैं

एक राबड़ी देवी का मुख्यमंत्री बनाया जाना, और दूसरा जीतनराम मांझी को सीएम की कुर्सी मिल जाना। प्रतिकूल परिस्थितियों में मुख्यमंत्री बनाने का जीतनराम मांझी जैसा प्रयोग पहले तमिलनाडु में भी देखने को मिला है और दोनों ही प्रयोगों के अलग अलग नतीजे देखने को मिले हैं। चंपई सोरेन अब झारखंड के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। लेकिन पहले मुख्यमंत्री पद की रेस में उनका नाम नहीं था। अंदरखाने की बात जो भी हो, हो सकता है साइलेंट दावेदार रहे हों, लेकिन बाहर तो उनके नाम की चर्चा नहीं ही आई थी। कम से कम शुरुआती दौर में। हेमंत सोरेन जेल जाने की सूरत में पत्नी कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, ताकि लौटने तक कुर्सी सुरक्षित हाथों में रहे। ठीक वैसे ही जैसे जेल जाने की नौबत आने पर आरजेडी नेता लालू यादव ने पत्नी राबड़ी देवी को चीफ मिनिस्टर की कुर्सी सौंप दी थी। मान कर चलना चाहिये हेमंत सोरेन भी कल्पना सोरेन के लिए राबड़ी देवी की ही तरह सलाहकारों की फौज तैनात करने का प्लान कर चुके हों। लेकिन झामुमो विधायक सीता सोरेन के विरोध के चलते हेमंत सोरेन मनमाफिक फैसला नहीं ले सके। उनकी भाभी सीता सोरेन का कहना था कि हेमंत सोरेन को तो स्वीकार कर लिया, कल्पना को मुख्यमंत्री बनाया जाना तो वो हरगिज ने मंजूर करेंगी। पारिवारिक कलह इस कदर बढ़ी कि थक हार कर परिवार के बाहर विकल्प की तलाश शुरू हुई, और नजर दौड़ाने पर सबसे करीब और भरोसेमंद चंपई सोरेन ही नजर आये चंपई सोरेन भी हेमंत सोरेन के लिए अब तक उतने ही भरोसेमंद रहे हैं, जितने कि कभी जीतनराम मांझी, नीतीश कुमार के लिए और ओ. पन्नीरसेल्वम तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जे. जयललिता के लिए।

चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री की कुर्सी क्यों मिली?

चंपई सोरेन झारखंड के कोल्हान क्षेत्र से आते हैं, जिसे बीजेपी का गढ़ माना जाता है। और चंपई सोरेन को कोल्हान का शेर भी कहा जाता है। सोशल मीडिया पर अब चंपई सोरेन के समर्थक उनको झारखंड का शेर कह कर संबोधित करने लगे हैं। अभी के लिए तो चलेगा ही। हक भी बनता है। चंपई सोरेन का परिचय सिर्फ यही नहीं है कि वो शिबू सोरेन के करीबी सहयोगी और झामुमो के संस्थापक सदस्यों में शुमार हैं। चंपई सोरेन को असल में शिबू सोरेन ही नहीं, हेमंत सोरेन का भी बेहद भरोसेमंद नेता माना जाता है, और पार्टी के साथ साथ परिवार में भी उनका बहुत सम्मान रहा है। कुछ लोग चंपई सोरेन को हेमंत सोरेन का यस-मैन भी कहते हैं, लेकिन वो चंपई सोरेन का कितना सम्मान करते हैं, सार्वजनिक कार्यक्रमों की तस्वीरों में देखा जा सकता है। एक पुरानी तस्वीर में हेमंत सोरेन को झुक कर प्रणाम करने की मुद्रा में देखा गया है, और सामने सीधे खड़े चंपई सोरेन आशीर्वाद देने का भाव लिये हुए लगते हैं – ऐसा लगता है जैसे हेमंत सोरेन और चंपई सोरेन एक दूसरे में पिता-पुत्र का भाव देख रहे हों। लेकिन चंपई सोरेन को झामुमो के मुख्यमंत्री चुने जाने में सिर्फ ये भाव ही नहीं है। दरअसल, चंपई सोरेन का झारखंड के कोल्हान बेल्ट से होना भी एक खास वजह है, जो पूरी तरह राजनीतिक है। ध्यान देने वाली बात ये है कि कोल्हान क्षेत्र से चंपई सोरेन के रूप में झारखंड को चौथा मुख्यमंत्री मिला है। असल में कोल्हान क्षेत्र को बीजेपी का गढ़ माना जाता है। चंपई सोरेन से पहले बीजेपी के दो नेता अर्जुन मुंडा और रघुबर दास भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं। वैसे एक और मुख्यमंत्री मधु कोड़ा भी कोल्हान इलाके से आते हैं।
2019 के झारखंड चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन अपेक्षा के मुताबिक नहीं रहा। इलाके की 13 सीटों पर बीजेपी उम्मीदवारों बड़े ही कम वोट पा सके। सबसे बड़ा झटका तो बीजेपी को झारखंड पूर्व सीट पर लगा जहां तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुबर दास भी बीजेपी के ही बागी नेता सरयू राय से भारी अंतर से चुनाव हार गये।
चंपई सोरेन की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में एक खास वजह ये भी लगती है, जिसे राजनीतिक रूप से मौजूदा हालात में दुरूस्त एन एफ। समझा जा सकता है। बशर्ते, चंपई सोरेन आगे भी इसी भाव से काम करते रहें।

चंपई सोरेन का भी मन बदल गया तो?

मन का क्या है… कभी भी, किसी का भी बदल सकता है। सत्ता ऐसी चीज ही होती है। और राजनीति में भी तो जंग और मोहब्बत की तरह सब कुछ जायज ही माना जाता है। हेमंत सोरेन की मानें तो वो भी राजनीतिक का ही शिकार हुए हैं।
देखा जाये तो इस मामले में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता बेहद खुशकिस्मत रही हैं। अब हेमंत सोरेन की किस्मत क्या करवट लेती है, फैसला वक्त के हवाले हैं। अपने राजनीतिक बुद्धि चातुर्य से बिहार की कुर्सी पर कुंडली मार बैठे माने जाने वाले नीतीश कुमार भी इस मामले में गच्चा खा चुके हैं। 2014 के लोक सभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था। कुछ कुछ वैसे ही जैसे तमिलनाडु में जेल जाने की नौबत आने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता अपने बेहद भरोसेमंद ओ. पन्नीरसेल्वम को कुर्सी सौंप देती थीं। ओ. पन्नीरसेल्वम तो जयललिता के जेल से लौटते ही कुर्सी सौंप दिया करते थे। लेकिन जब नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी से कुर्सी छोड़ने को कहा तो वो फैल गये। तब राजनीतिक हालात भी ऐसे थे कि बीजेपी केंद्र की सत्ता पर काबिज हो चुकी थी, और नीतीश कुमार एनडीए छोड़ चुके थे।


जीतनराम मांझी को पंसद करने वाले बिहार सरकार के कुछ नौकरशाह उनके सलाहकार बन गये थे। राजनीतिक समीकरण भी ऐसे थे कि सलाहकारों के साथ साथ जीतनराम मांझी को बीजेपी का भी सपोर्ट मिलने लगा था। जीतनराम मांझी बयानबाजी तब तक करते रहे जब तक उनके लिए संभव था, लेकिन आखिर में घुटने टेक दिये और नीतीश कुमार कुर्सी पर फिर से काबिज हो गये। देखा जाये तो नीतीश कुमार से पाला बदल कर मुख्यमंत्री बदलने में जितनी मेहनत नहीं करनी पड़ती, जितना जीतनराम मांझी से सत्ता वापस लेने में करनी पड़ी थी। अब देखना हैं कि चंपई सोरेन ‘मांझी’ बन कर हेमंत सोरेन की नाव डुबाने में जुट जाते हैं, या ‘पन्नीरसेल्वम’ की तरह उनकी तस्वीर को साक्षी मान कर उनके जल्द से जल्द लौटने का इंतजार करते हैं?

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