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जातिगत जनगणना से क्यों परहेज करती हैं सरकारें?

Desk: हमारे देश में जाति हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक पीछे पड़ी रहती है। चाहे जन्म हो, विवाह हो या अंतिम संस्कार, जाति तय करती है कि इन सभी रस्मों को कैसे किया जाना चाहिए। हर सरकारी दस्तावेज हमसे हमारी जाति का वर्ग पूछता है। लोगों को उनके जाति पहचान प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव के दौरान नौकरियों और आरक्षित सीटों पर बैठाया जाता है। लोगों के नाम उनकी जाति के नाम से ही पूरे होते हैं। यहां तक कि तथाकथित बड़े लोग भी अपने जातिगत गौरव पर लटके रहते हैं।

आसान शब्दों में कहें तो इस बात से कोई परहेज नहीं है कि आज हमारे समाज में जातियां मौजूद हैं और अगर हैं भी तो उन्हें गिनने और सही आंकड़े पूरे देश के सामने लाने में क्या हर्ज है? जैसे घर होते हैं, जमीन होती है, सड़कें होती हैं, स्कूल होते हैं, गायें होती हैं, जंगल होते हैं, उसी तरह जातियां भी होती हैं- और जैसे उनकी गिनती होती है, वैसी ही जातियां होंगी।

जातिगत जनगणना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सैकड़ों ऐसी जातियां हैं जो खानाबदोश हैं और आज भी एक पहचान और विकास से वंचित हैं। उनके बारे में तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करने से उनकी सुरक्षा और विकास के लिए कार्यक्रम तैयार करना संभव होगा। देश उन जातियों के बारे में भी जानेगा जिन्हें पहले ही बहुत फायदा हो चुका है और जिन्हें हमारा तथाकथित विकास छू भी नहीं पाया है।

जातिगत जनगणना का विरोध केवल हिंदुओं की ओर से नहीं है। मुस्लिम, ईसाई और सिख भी डरे हुए हैं, क्योंकि इन समुदायों में भी जातियां मौजूद हैं और दलित मुस्लिम, दलित ईसाई और दलित सिख अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

कई लोगों ने जातिगत जनगणना को ब्रिटिश काल की “फूट डालो और राज करो” की मानसिकता से जोड़ा है, लेकिन क्या वे जानते हैं कि ब्रिटिश शासन से लगभग 200 साल पहले, 1658 और 1664 के बीच, महाराजा द्वारा शासित मारवाड़ राज्य के गृह मंत्री मुन्हाता नैंसी जसवंत सिंह राठौड़ ने पहली जातिगत जनगणना कराई थी? तो यह कैसे एक विदेशी दिमाग का डिजाइन बन जाता है?

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यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सभी तर्क जनगणना प्रश्नावली में जाति के कॉलम को हटाने के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं। पूरी बहस इस बात पर है कि जातिगत जनगणना होनी चाहिए या नहीं? जबकि हमें वास्तव में इस बात पर बहस करनी चाहिए कि हमें इस देश में जातियों की जरूरत है या नहीं। जिस दिन जाति का नामोनिशान मिट जाएगा, अस्पृश्यता, भेदभाव, असमानता, जातिवादी घृणा, जातीय नरसंहार और आरक्षण की लड़ाई स्वतः ही मिट जाएगी और न ही राजनेता जाति के आधार पर राजनीति कर पाएंगे। ‘जाति छिपाओ, जनगणना में अपनी जाति मत बताओ’ कहने के अभियान चल रहे हैं, लेकिन हममें से कितने लोग कह रहे हैं, ‘चलो जाति खत्म करो’?

राजनीतिक दलों को इस बात का डर है कि अभी जो राजनीति होती है। उसका ठोस आधार नहीं है।उसे चुनौती दी जा सकती है, लेकिन एक बार जनगणना में वो दर्ज हो जाएगा, तो सब कुछ ठोस रूप ले लेगा।कहा जाता है, ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’. अगर संख्या एक बार पता चल जाए और उस हिसाब से हिस्सेदारी दी जाने लगे, तो कम संख्या वालों का क्या होगा? उनके बारे में कौन सोचेगा? इस तरह के कई सवाल भी खड़े होंगे। ओबीसी और दलितों में ही बहुत सारी छोटी जातियां हैं, उनका कौन ध्यान रखेगा? बड़ी संख्या वाली जातियां आकर मांगेगी कि 27 प्रतिशत के अंदर हमें 5 फ़ीसदी आरक्षण दे दो तो बाक़ियों का क्या होगा? ये जातिगत जनगणना का एक नकारात्मक पहलू है। लेकिन एक सकारात्मक पहलू ये भी है कि इससे लोगों के लिए नीतियां और योजनाएं तैयार करने में मदद मिलती है।

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