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बिहार के दलित-महादलित पर राजनीति तेज, साधने की कवायद शुरू ।

बिहार में दलित महादलित को साधने की कवायत शुरू हो गई है । 2024 में लोकसभा का चुनाव है और इसके मद्देनजर तमाम पार्टियां सभी समाज को साधने का प्रयास कर रही हैं । इसी कड़ी में दलित और महादलित को भी साधा जा रहा है। लगातार यह देखा जा रहा है कि तमाम पार्टियां जाति आधारित कार्यक्रम कर रही है। बिहार के सारे दल दलित और महादलित को लेकर कार्यक्रम कर रहीं हैं । जदयू के तरफ से अशोक चौधरी ने दलित महादलित का एक बड़ा जुटान किया था, उसके बाद भारतीय जनता पार्टी भी दलित महादलित का जुटान कर रही है उसके बाद जीतन राम मांझी का भी कहना है कि हम भी एक बड़ा कार्यक्रम करेंगे जिसमें दलित और महादलित आएंगे यानी कि दलित और महादलित के ऊपर काफी राजनीति हो रही है ऐसे अगर देखा जाए तो बिहार में तीन पार्टिया है जो मुख्य तौर पर रहती है कि वह दलित और महादलित की पार्टी है पहले पार्टी जिसे स्वर्गीय रामविलास पासवान ने बनाया था जो की चाचा और भतीजे की लड़ाई में दो हिस्सों में बट कर रह गई । पहला हिस्सा चिराग पासवान के पास है जो कि स्वर्गीय रामविलास पासवान के बेटे हैं और दूसरा हिस्सा पशुपति पारस के पास है जो कि स्वर्गीय रामविलास पासवान के भाई है और उसके बाद जीतन मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा भी दलित की बात करती है इन तमाम पार्टियों के इतर जदयू और भाजपा दलितों को साधने में लगी हुई है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब शीतकालीन सत्र में जीतन राम मांझी को बेइज्जत करते हैं तब भारतीय जनता पार्टी को एक बड़ा मौका मिलता है कि वह दलित को अपने खेमे में कर ले लेकिन उनके सारे किए कराए पर जदयू के मंत्री अशोक चौधरी पानी फेर देते हैं अशोक चौधरी पटना के वेटरनरी कॉलेज के ग्राउंड में दलित महादलित का जुटान करते है और यह दिखा देते हैं कि दलित और महादलित सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार के साथ है और अब भारतीय जनता पार्टी उसे जुटान को दबाने के लिए अंबेडकर के नाम पर एक बड़ा कार्यक्रम कर रही है और उसे कार्यक्रम के माध्यम से वह भी दलित और महादलित को साधनी का प्रयास कर रही है

आखिर क्यों साधे जा रहें दलित और महादलित

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों दलित और महादलित पर इतनी जोर दिए जा रहे हैं क्यों इनको साधने का प्रयास किया जा रहा है बता दे आपको की बिहार में जाति आधारित जनगणना के रिपोर्ट के अनुसार दलित और महादलित की संख्या लगभग 20% है और 20% जिनकी आबादी हो बिहार की राजनीति में उनका अनदेखा नहीं किया जा सकता ओबीसी की संख्या लगभग 27% बीसी की संख्या लगभग 36 प्रतिशत इस पर तो राजनीति हो ही रही है वहीं तमाम पार्टियों यह देख रही है कि दलित और महादलित की जो संख्या है वह लगभग 20% है और इस पर बिहार की दो ही तीन परियां राज करने का प्रयास कर रही है ऐसे ओबीसी और ओबीसी पर तो तमाम पार्टियों का दावा है कि वह हमारे वोटर है यह भी हमारे वोटर है लेकिन दलित और महादलित वोट जो है वह तीन पार्टियों के पास सीमेंट के रह जा रहा था तो अब तमाम पार्टियों लगी हुई है कि इसको किसी तरीके से अपने खेमे में कर लिया जाए ताकि 2024 में दलित और महादलित उनको वोट कर सके और चुनाव जीत सके अब लगातार कार्यक्रम हो रहे हैं और कार्यक्रम में दलित महादलित झूठ भी रहे और अब देखने वाली बात यह है कि दलित और महादलित किसके तरफ जाते हैं

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