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यूनिफॉर्म सिविल कोडःसामाजिक जरूरत या राजनीतिक मजबूरी

समान नागरिक संहिता को लेकर इतनी जल्दबाजी क्यों?

देश में एक बार फिर एक देश, एक विधान की मांग तेज हो गई है। भारत में समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए बीजेपी सक्रिय दिख रही है। पार्टी नेताओं की तरफ से बयान लगातार बयानबाजी हो रही है। बीजेपी के नेता Uniform Civil Code(यूसीसी) की वकालत करने में लगे हैं। लेकिन ऐसे में एक सवाल लाजमी है कि क्या वाकई समाज को इसकी आवश्यकता है? क्या बहुविवाह प्रथा को समाप्त करने से सिविल कोड को यूनिफॉर्म मान लिया जाएगा? भारतीय समाज, विविधता जिसकी ताकत है क्या वहां एक देश एक विधान बनाने का कदम, इसकी आत्मा को बदलने जैसा नहीं है।

समान नागरिक संहिता को लेकर इतनी जल्दबाजी क्यों?
आखिर क्या बात है कि बीजेपी समान नागरिक संहिता(यूसीसी) को लेकर इतनी सक्रिय है। इस सवाल पर से पर्दा उठाते हुए कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह 2024 के चुनाव की तैयारी है। विभिन्न सामाजिक वर्गों में बंटे वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए बीजेपी इसका इस्तेमाल करना चाहती है। समान नागरिक संहिता 2024 में बीजेपी के चुनाव का मुख्य एजेंडा हो सकता है। वहीं बीजेपी की तरफ से अलग-अलग दलीलें आ रही हैं। नरेंद्र मोदी ने अपने एक बयान में कहा कि एक घर में दो कानून कबतक चलेगा। इसलिए समान नागरिक संहिता लाकर देश से दोहरी व्यवस्था को खत्म किया जाएगा।

आरोपों के घेरे में बीजेपी-
वर्ष 2016 में केंद्र सरकार ने समान नागरिक संहिता(यूनिफॉर्म सिविल कोड) पर आम लोगों के विचार जानने के लिए इसे विधि आयोग को सौंपा था। इसपर विधि आयोग ने दो साल तक आवश्यक जानकारी जुटाई। इसके बाद आयोग ने कहा कि इसकी आवश्यकता अभी देश को नहीं है। वहीं रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि समान नागरिक संहिता देश भारत(India) के लिए वांछनीय नहीं है।
इन्हीं रिपोर्ट के हवाले से विपक्षी पार्टियां बीजेपी पर यूससी के बहाने राजनीति करने का आरोप लगा रही हैं। इनका कहना है कि लोकसभा चुनाव से पूर्व बीजेपी देश में ध्रवीकरण कर रही है।

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